जिस जानिब से सर पर मेरे, आकर के पत्थर निकले |
मुड़कर देखा जब मैंने तो, यारों ही के घर निकले |
दर्द ग़मों का किसी गली में, आये तुमको नज़र कहीं,
'मधुप' के घर को समझ लो यारों,जाकर वही डगर निकले |
हिंदी के सुधी पाठकों के लिए प्रतिष्ठित कवि-गीतकार-ग़ज़लकार-अभिनेता एवं ज्योतिष विशेषज्ञ डॉo अशोक मधुप के गीत, ग़ज़ल, मुक्तक एवं कविताओं का अनूठा संग्रह |
गीत ***** शताब्दी का संकल्प **************** शताब्दी का ये पावन क्षण, जागा फिर विश्वास है। सेवा, समर्पण, राष्ट्रधर्म—यही हमारी आस है। संघ ...
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