गीत
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शताब्दी का संकल्प
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शताब्दी का ये पावन क्षण, जागा फिर विश्वास है।
सेवा, समर्पण, राष्ट्रधर्म—यही हमारी आस है।
संघ चला था दीप लिए, आज बना आकाश है।
नन्हे कदमों से शुरू हुआ, एक साधना का मार्ग,
हिंदुत्व की ज्योति जली, मिटा अंधेरों का भार।
शाखाओं की धुन में गूंजे, एकता का स्वर महान।
हर स्वयंसेवक में दिखता, राष्ट्र प्रेम का अभिमान।
शताब्दी का ये पावन क्षण, जागा फिर विश्वास है। ....
सेवा के पथ पर चलकर, जन-जन का उद्धार किया।
वनवासी, ग्राम, नगर सभी में, नवजीवन संचार किया।
संस्कारों की नींव मजबूत, चरित्र का निर्माण हुआ।
भारत माँ के चरणों में, जीवन सारा अर्पण हुआ।
शताब्दी का ये पावन क्षण, जागा फिर विश्वास है। ....
सीमा से लेकर गांव तलक, हर दिल में विश्वास जगा।
संघ के विस्तार ने जग में, भारत का मान बढ़ा।
शिक्षा, सेवा, संस्कृति संग, बढ़ता गया कारवां,
शताब्दी की इस बेला में, फिर गूंजे राष्ट्रगान।
शताब्दी का ये पावन क्षण, जागा फिर विश्वास है। ....
नव युग का अब आह्वान है, फिर से वही प्रण दोहराएँ।
एकात्म मानव के सपनों को, साकार हम बनाएं।
आने वाले सौ वर्षों में, और ऊँचा हो ध्वज हमारा।
विश्वगुरु भारत बने—यही स्वप्न है हमारा।
शताब्दी का ये पावन क्षण, जागा फिर विश्वास है। ....
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©सर्वाधिकार सुरक्षित।
पूर्णतया मौलिक एवं स्वरचित।
डॉ. अशोक मधुप
वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं अभिनेता।
नोएडा।

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