गीत
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तुम छू लो चन्दन बन जाऊँ।
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गंधहीन जीवन है मेरा,
तुम छू लो चन्दन बन जाऊँ।
तुम कंचन मैं निपट अकिंचन,
जैसे हो माटी का ढेला।
दास तुम्हारा वैभव, पर मैं
भरी भीड़ में खड़ा अकेला।
पारसमणि सी देह तुम्हारी,
तुम छू लो कुन्दन बन जाऊँ।
मीलों पता नहीं मंज़िल का,
पीड़ा मेरे संग अकेली।
सुन्दरता तेरी चेरी है,
ख़ुशियाँ तेरी सखी-सहेली।
जब भी तुम श्रृंगार करो तो,
मैं तेरा दरपन बन जाऊँ।
पनघट प्यासा, तन-मन प्यासा,
सारा जीवन ही प्यासा है।
कोई अभिलाषा है ऐसी,
तो यह केवल अभिलाषा है।
तुम यदि सावन बनकर बरसो,
तो मैं वृन्दावन बन जाऊँ।
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(डॉ. अशोक मधुप),
वरिष्ठ गीतकार, ग़ज़लकार एवं अभिनेता,
नोएडा।

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