मुक्तक - आकर के पत्थर निकले |

मुक्तक
*****
जिस जानिब से  सर पर मेरे,    आकर के  पत्थर निकले |
मुड़कर देखा   जब  मैंने   तो,    यारों  ही  के   घर निकले |
दर्द  ग़मों का  किसी गली में,   आये  तुमको  नज़र  कहीं, 
'मधुप' के घर को समझ लो यारों,जाकर वही डगर निकले |

                                                       -----डा. अशोक मधुप    
Share on Google Plus

About Dr. Ashok Madhup

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

गीत - हे गुरु! तुमसे ही उजियारा

(भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयन्ती एवं शिक्षक दिवस पर विशेष प्रस्तुति)              गीत             ***** गुरु! तुमसे ही उजियारा *...