आकर के पत्थर निकले |

जिस जानिब से  सर पर मेरे,    आकर के  पत्थर निकले |
मुड़कर देखा   जब  मैंने   तो,    यारों  ही  के   घर निकले |
दर्द  ग़मों का  किसी गली में,   आये  तुमको  नज़र  कहीं, 
'मधुप' के घर को समझ लो यारों,जाकर वही डगर निकले |

                                                       -----डा. अशोक मधुप    
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ग़ज़ल

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