हमने क्या क्या मंज़र देखे |

हमने क्या क्या मंज़र देखे | ढहते - गिरते खंडहर देखे | हरे -भरे थे खेत जहाँ पर, आज वहाँ पर बंजर देखे | प्यासी नदिया, ठंडी गर्मी, सूखे  हुए  ...
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मुक्तक

 जिस जानिब से सर पर मेरे, आकर के पत्थर निकले। मुड़कर देखा जब मैंने तो यारों ही के घर निकले। दर्द ग़मों का किसी गली में, आये तुमको नज़र कहीं, ...