हमने क्या क्या मंज़र देखे |

हमने क्या क्या मंज़र देखे |
ढहते - गिरते खंडहर देखे |

हरे -भरे थे खेत जहाँ पर,
आज वहाँ पर बंजर देखे |

प्यासी नदिया, ठंडी गर्मी,
सूखे  हुए  समंदर   देखे |

अपनों पर ही वार करें जो,
ऐसे - ऐसे  खंज़र   देखे |

रिश्तों के सागर के तट पर,
यादों के  कुछ  कंकर देखे |

क्षणभर में जो दुनिया बदलें,
'मधुप'  ने  ऐसे मंतर  देखे | 
      
                               ----- डा० अशोक मधुप  
(गीतकार-ग़ज़लकार-अभिनेता एवं निर्देशक)   
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About Dr. Ashok Madhup

1 comments:

  1. बहुत ही खुबसुरत रचना है कई पंक्तियाँ मन को छू जाती है ,आखिरी दो पंक्तियाँ तो कमाल है ....पहली बार ब्लॉग पर आना हुआ,ख़ुशी हुई इतनी प्यारी रचना पढ़ कर......

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