ग़ज़ल

आग दिल में लगी, किस क़दर देखिये।

जल गया है मेरा घर का घर देखिये।

एक ख़ुश्बू फ़िज़ा में घुली हर तरफ़,

कोई गुज़रा है महताब इधर देखिये।

हक़परस्तों का मैं राहबर था कभी,

आज नेज़े पे है मेरा सर देखिये।

दो कदम न चला जो रहे-इश्क़ में,

मुझको ऐसा मिला हमसफ़र देखिये।

क़त्ल मेरा हुआ  और  मैं  बेख़बर,

क़ातिलों का ज़रा ये हुनर देखिये।

हूँ ज़माने से ग़ाफ़िल 'मधुप' आजकल,

ये तसव्वुर का उनके असर देखिये।

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             डॉ. अशोक मधुप,

वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं अभिनेता।  नोएडा।.

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