गीत - हे गुरु! तुमसे ही उजियारा

(भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयन्ती एवं शिक्षक दिवस पर विशेष प्रस्तुति)

             गीत

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गुरु! तुमसे ही उजियारा

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अँधियारे पथ पर दीप जलाकर,

चलना हमें सिखाते हो।

गिरकर फिर से उठना सिखाकर,

जीवन-पथ दिखलाते हो।

हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा। 


कितने ही अनकहे प्रश्नों का,

तुम उत्तर बन जाते हो।

सूखी धरती जैसे मन में,

आशा-सुमन खिलाते हो।

अक्षर-अक्षर ज्ञान तुम्हारा,

बनता जीवन-मंत्र।

तुमसे ही तो सीख रहे हम,

सत्य, प्रेम और तंत्र। 


हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा। 


जब हम खुद पर हार गए थे,

तुमने विश्वास जगाया।

छोटी-सी कोशिश को तुमने,

बड़ी सफलता बताया। 

हममें छिपे हुए सामर्थ्य को,

तुमने पहचान लिया।

माटी को छूकर अपने हाथों,

उसमें स्वर्ण प्राण दिया। 


हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा ।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा।


 तुम केवल पाठ नहीं पढ़ाते,

जीवन पढ़ना सिखलाते।

काँटों के बीचों-बीच हमें,

फूलों जैसा मुस्काना सिखाते।

तुम्हारे शब्दों की गर्मी से,

मन में सूरज उगता है।

गुरु का आशीष जहाँ मिल जाए,

भाग्य वहीं से जगता है।


हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा।


आज राधाकृष्णन जी की,

पावन स्मृति में शीश झुकाएँ।

शिक्षा को केवल ज्ञान न मानें,

जीवन का संस्कार बनाएँ।

गुरु की गरिमा, ज्ञान की महिमा,

घर-घर फिर से गाएँ।

जिस भारत का स्वप्न उन्होंने देखा,

उस भारत को मिलकर बनाएँ। 


हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा ।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा। 


जो दीप मिला है गुरुजनों से,

वह दीप जलाते जाएँ।

एक हृदय से दूसरे हृदय तक,

ज्ञान-प्रकाश पहुँचाएँ।

कल के नन्हे सपनों में हम,

आज की आशा भर दें।

गुरु के ऋण को शब्दों से नहीं,

अपने कर्मों से भर दें। 


हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा ।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा।

जब तक साँसें, जब तक 

धड़कन गूँजे यही पुकार—

गुरु तुम जीवन के पथ-प्रदर्शक,

गुरु तुम ही आधार। 


हे गुरु! तुम्हें शत-शत नमन,

तुमसे ही उजियारा ।

तुमसे ही सपनों को मिलता,

जीने का सहारा। 

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ज्ञान-ज्योति के अमर पुजारियों को,

शिक्षक दिवस पर कोटि कोटि प्रणाम!

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©सर्वाधिकार सुरक्षित।

पूर्णतया मौलिक एवं स्वरचित।

डॉ. अशोक मधुप,

वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं अभिनेता।

नोएडा।

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