गीत
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बनजारन हो गई ज़िन्दगी
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बनजारन हो गई ज़िन्दगी,
ये है अपनी राम कहानी।
ना है कोई ठौर ठिकाना,
रमता जोगी, बहता पानी।
उजियारा तो नामदार
लोगों के हिस्से में आया।
अँधियारा केवल अपने
जीवन के किस्से में आया।
अब तो यह बन गई ज़िन्दगी,
जैसे चौसर की गोटी,
या तो चले चलाये न ज्यों,
कोई एक चवन्नी खोटी।
खोटे सिक्के के जैसा है,
अपना ये जीवन बेमानी।
बनजारन हो गई ......।।
मन का मीत मिला न कोई,
भटकी भटकी फिरी उमरिया।
छलिया सारे मिले डगर में,
लूट ले गए मेरी गठरिया।
मैं ऐसी कश्ती पर बेठा,
जो डूबी ठीक किनारे पर।
टूटी थी पतवार भी उसकी,
बैठा जिसके सहारे पर।
मैं डूबा उस जगह जहाँ पर,
बिल्कुल उथला सा था पानी।
बनजारन हो गई ..........।।
अभिनन्दन, सम्मान हुआ औ'
उनकी पोथी हुई पुरस्कृत।
प्रेम का ढाई अक्षर मेरा
और दर्द रह गया तिरस्कृत।
नगमें कोई लिखे न मैंने
चुम्बन, चोली या चूनर पर,
महिमा मण्डन किया मैंने,
महलों पर या झूमर पर।
इसीलिए रह गई उपेक्षित,
सारे जग के पीर की बानी।
बनजारन हो गई .........।।
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©सर्वाधिकार सुरक्षित। पूर्णतया मौलिक एवं स्वरचित।
डॉ. अशोक मधुप,
वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं अभिनेता।
नोएडा।

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