गीत - प्यार यदि करके निभाने

 (परमपूज्य गुरुदेव अन्तर्राष्ट्रीय कवि, गीतसम्राट, पद्मविभूषण डॉ. गोपालदास नीरज की काव्यशैली में रचित गुरुदेव को समर्पित गीत)

               गीत

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प्यार यदि करके निभाने का इरादा

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ही न था

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प्यार यदि करके निभाने का इरादा ही न था,

रोज़ फिर क्यों मुझे तुम छुप के मिला करती थीं?  

मेरी आहट पे तेरे कान लगे रहते थे,

हो के बेसब्र क्यों फिर राह तका करती थीं?


मेरे सीने से लिपटने की तेरी शोख़ आदा,

तेरी उल्फ़त, वो जुनूँ, मेरा वो दीवानापन।

भूल सकता नहीं ये दिल वो सुहाना आलम,

वस्ल की शब में तेरा प्यार, तेरा अपनापन।


ज़िन्दगी भर के लिए प्यार का वादा करके,

कभी रिश्तों को मेरा नाम दिया था तुमने।

और देकर मुझे अनजाना सा अहसास नया,

प्यार को फिर नया आयाम दिया था तुमने।


याद तो होंगे तुम्हें काँधे पे सिर को रख के,

प्यार के पल जो मधुर साथ बिताये तुमने।

और वादे जो किये थे कभी जीवन भर के,

कौन वादे हैं अभी तक जो निभाये तुमने।


कितनी बेदर्द सियाही है ये तन्हाई की,

नहीं मालूम कि कब इसकी सहर हो कि न हो।

शबे-उल्फ़त की फ़ज़ाओं में घना कुहरा है,

क्या पता सुबह को ये ताबे-नज़र हो कि न हो।


दिल है नादान बहुत पर कहीं लगता ही नहीं,

इतना बहलाता हूँ फिर भी ये कहाँ तक बहले?

तेरे बिन ज़िन्दगी ढोने के सिवा कुछ भी नहीं,

बात दो-चार दिनों की हो तो कोई सह ले।


मेरी महबूब! मेरे दिल की जवाँ धड़कन हो,

तेरे दीदार को अब आँखें मचल उठती हैं।

तुमको अपनाने की ख़्वाहिश में औ' पाने के लिए,

मेरी बेताब उमंगें भी मचल उठती हैं।


मेरे आगोश की गर्मी औ' महक साँसों की,

मेरे एहसास को अब तक भी सदा देती है।

और अब तेरे तग़ाफ़ुल की नई रोज़ अदा,

दिल में जलते हुए शोलों को हवा देती है।


तू बता अपनी जवानी की महकती ख़ुशबू,

दिल के गुलशन से मेरे ले के कहाँ जाऐगी?

मेरे ज़ज़्बातों से जो खेल हैं खेले तुमने,

मेरा दावा है कि ताउम्र तू पछताऐगी।

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©सर्वाधिकार सुरक्षित। पूर्णतया मौलिक एवं स्वरचित।

  डॉ. अशोक मधुप,

वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं अभिनेता।

नोएडा।

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